राष्ट्र निर्माण की धुरी है यह भव्य राम मंदिर

राष्ट्र निर्माण की धुरी है यह भव्य राम मंदिर

विवेक अष्ठाना 

रामराज्य को भारत के लिए आदर्श के रूप में निरूपित किया गया है। यह सुशासन के लिए आवश्यक प्रत्येक मान बिंदु को परिपूर्ण करता है । भारत के संविधान में जिन चित्रों को शामिल किया गया है उसमें राज्य करते राम प्रथम है। इन दिनों राम मंदिर निर्माण को लेकर काफी कुछ समाज में चल रहा है।  तथाकथित बुद्धिजीवियों में इससे अजीब सी बेचैनी है। उनका मानना है राम मंदिर के लिए इतना सब कुछ क्यों किया जा रहा है ? इस पर बिंदुवार चर्च करना आवश्यक लगता है ।

राम मंदिर निर्माण में समाज की भूमिका क्यों आवश्यक है,  इसे समझने के लिए राम के जीवन एवं भारतीय संस्कृति को गहराई तक जानना आवश्यक है। राम वह आदर्श है जो हिंदू संस्कृति का मूर्तिमंत स्वरूप है। जिस संस्कृति को देव संस्कृति के रूप में चित्रित किया गया है, उसकी उदात्त परिकल्पना राम के जीवन को देखकर सहज समझी जा सकती है । जिस भारत की कल्पना प्राचीन समय से आज तक की जा रही है वह  इसी संस्कृति का छाया रूप है।भारतीय संस्कृति को शुरू से ही अभ्युदय कारक एवं निःश्रेय की प्राप्ति कराने वाला माना गया है। इसीलिए बार-बार कहा गया है “यूनान मिस्र रोमा सब मिट गए, लेकिन कुछ बात है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी।” 

मैं फिर से दावे के साथ कह सकता हूं आज दुनिया में जितने भी संप्रदाय दिखते हैं वह नष्ट होंगे लेकिन हिंदू संस्कृति चिरंतन है और आगे भी निर्बाध चलती रहेगी इसके पीछे मेरा कोई पूर्वाग्रह नहीं बल्कि हिंदू संस्कृति के ताने-बाने को देखकर की गई वैज्ञानिक पुख्ता धारणा है ; जो संस्कृति सत चित्त एवं आनंद को जीवन में प्राप्त करना बताती हो, जो सहिष्णुता सिखाती हो, जो वासुदेव सर्वम का भाव देती हो, उस संस्कृति को कैसे मिटाया जा सकता है। सत, चित्त, आनंद का अर्थ भी हाथों हाथ समझ लेना विषय प्रवेश के लिए आवश्यक है ।

सत अर्थात जो घटित होना है, चित्त अर्थात  वह भाव  जो हमारे मन में है जो सबके कल्याण का कारक हैं और आनंद अर्थात उपरोक्त दोनों भावों  की सम्यक प्राप्ति होने पर मिलने वाला एक अभूतपूर्व सुख। कल्पना कीजिए आपका जीवन इन तीन भावों के अतिरिक्त और क्या है हिंदू संस्कृति में इन तीनों का ही समावेश है।  भारतीय संस्कृति और हिंदू संस्कृति भिन्न नहीं है दोनों को पर्यायवाची कहां जाए तो अतिशयोक्ति नहीं है। राम इस देव संस्कृति के नायक हैं। यही कारण है की राम के जीवन काल को खत्म हुए सहस्त्र वर्ष से अधिक का समय बीत गया लेकिन वह भारतीय जनमानस में आज भी जीवंत है।

राम एक ऐसा चरित्र है जिसके आधार पर समस्त हिंदू एक हो जाता है । अपने सारे राग द्वेष भूल जाता है। राम होने का अर्थ  किसी पंथ का देव होने से नहीं, बल्कि उस जीवन से है जिसने हमें अब तक अक्षुण्य बनाए रखा है। राम के जीवन में अभ्युदय भी है और निःश्रेयस भी। राम राजा भी हैं और कुशल समाज संगठन करता भी। राम आदर्श पुत्र हैं तो श्रेष्ठ वनवासी भी। इतनी सारी विशेषताएं  लिए जो जीवन है वही राम है; और हमारी हिंदू कल्पना में जो आदर्श जीवन है वह राम है। इसलिए राम का मंदिर सिर्फ  इमारत नहीं यह संस्कृति का पुनर एकीकरण का भागीरथ  प्रयास है।

492 वर्षों तक लगातार मंदिर के लिए संघर्ष किया गया है। यह सांस्कृतिक जीवन की सर्वश्रेष्ठ अभिव्यक्ति है।

भारतीय धर्म से भिन्न जितने भी संप्रदाय है, वह सब एक ईश्वरवाद के साथ केवल एक अस्तित्व की बात करते है, लेकिन इससे इतर हिंदू धर्म घोड़े को भी भगवान मानता है, कछुए को भी वराह को भी मछली को भी पेड़ को भी अर्थात जिसको जिस रूप में, जिस प्रकार अच्छा लगे अपना आदर्श  चुनने के लिए स्वतंत्रता है। यह भिन्नता ही “राम” इस एक शब्द में परिलक्षित है। राम का जीवन भी  भिन्नता  की ही  झलक है इतनी  भिन्नता  के बाद भी  समाज के लिए  जो एकता चाहिए  उसके लिए  ‘ एको सत  विप्रा  बहुदा  वदंती’ बोलकर एकता  स्थापित की गई ठीक इसी सत्य को राम ने उत्तर से लेकर दक्षिण तक अपने वृहद देशाटन से स्थापित किया। इसलिए राम हमारी सांस्कृतिक चिति है और मंदिर निर्माण उसका सजीव चित्रण, जो आने वाली पीढ़ी को इस उदात्त भाव से जोड़े रखेगा।

अतः सहज ही कहा जा सकता है मंदिर केवल एक इमारत बनाने का कार्य नहीं बल्कि संस्कृति को पुनर्गठित करने का प्रयास है। यह अखंड भारत निर्माण की धुरी हैं।

ग्रामदीप से साभार

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