पहले गुरु पूर्णिमा उत्सव पर संघ को मिली थी 84 रुपए की दक्षिणा

पहले गुरु पूर्णिमा उत्सव पर संघ को मिली थी 84 रुपए की दक्षिणा

गुरु पूर्णिमा राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के छह प्रमुख उत्सवों में से एक है। पहलीबार यह आयोजन 1928 में हुआ था, तब पहली गुरु उत्सव में संघ को 84 रुपए 50 पैसे की दक्षिणा मिली थी।


आषाढ़ माह की पूर्णिमा तिथि को गुरु पूर्णिमा के नाम से जाना जाता है। इसी दिन दुनिया का सबसे बे सांस्कृतिक और राष्ट्रवादी संगठन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के स्वयंसेवक भी अपने गुरु भगवा ध्वज के प्रति समर्पण करते हैं। जहां संघ की स्थापना 1925 में हुई थी तो वहीं संगठन का पहला गुरु पूर्णिमा उत्सव 1928 में मनाया गया। इसमें कुल 84 रुपए 50 पैसे की गुरु दक्षिणा एकत्रित हुई थी। इस आयोजन के बाद के आज परिस्थितियां बहुत बदल गईं हैं और आज यह राशि कहीं अधिक है लेकिन ये 84 रुपए 50 पैसे कितने महत्वपूर्ण थे, इसकी आज कल्पना भी नहीं की जा सकती है।


व्यक्ति पूजा नहीं, तत्व पूजा


संघ तत्व पूजा करता है, व्यक्ति पूजा नहीं। व्यक्ति शाश्वत नहीं, समाज शाश्वत है। अपने समाज में अनेक विभूतियां हुई हैं, आज भी अनेक विद्यमान हैं। उन सारी महान विभूतियों के चरणों में शत्-शत् प्रणाम, परन्तु अपने राष्ट्रीय समाज को, संपूर्ण समाज को, संपूर्ण हिन्दू समाज को राष्ट्रीयता के आधार पर, मातृभूमि के आधार पर संगठित करने का कार्य राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ कर रहा है। इस नाते किसी व्यक्ति को गुरुस्थान पर न रखते हुए भगवाध्वज को ही हमने गुरु माना है।


तत्वपूजा- तेज, ज्ञान, त्याग का प्रतीक


हमारे समाज की सांस्कृतिक जीवनधारा में ‘यज्ञ’ का बड़ा महत्व रहा है। ‘यज्ञ’ शब्द के अनेक अर्थ है। व्यक्तिगत जीवन को समर्पित करते हुए समष्टिजीवन को परिपुष्ट करने के प्रयास को यज्ञ कहा गया है। सद्गुण रूप अग्नि में अयोग्य, अनिष्ट, अहितकर बातों को होम करना यज्ञ है। श्रद्धामय, त्यागमय, सेवामय, तपस्यामय जीवन व्यतीत करना भी यज्ञ है।
यज्ञ का अधिष्ठाता देव यज्ञ है। अग्नि की प्रतीक है ज्वाला, और ज्वालाओं का प्रतिरूप है-अपना परम पवित्र भगवाध्वज।
हम श्रद्धा के उपासक हैं, अन्धविश्वास के नहीं। हम ज्ञान के उपासक हैं, अज्ञान के नहीं। जीवन के हर क्षेत्र में विशुद्ध रूप में ज्ञान की प्रतिष्ठापना करना ही हमारी संस्कृति की विशेषता रही है।


राष्ट्राय स्वाहा- इदं न मम्


इसलिए प.पू. डॉ. हेडगेवार जी ने फिर से संपूर्ण समाज में, प्रत्येक व्यक्ति में समर्पण भाव जगाने के लिए, गुरुपूजा की, भगवाध्वज की पूजा का परंपरा प्रारंभ की।


व्यक्ति के पास प्रयासपूर्वक लगाई गई शारीरिक शक्ति, बुद्धिशक्ति, धनशक्ति होती है, पर उसका मालिक व्यक्ति नहीं, समाज रूपी परमेश्वर है। अपने लिए जितना आवश्यक है उतना ही लेना। अपने परिवार के लिए उपयोग करते हुए शेष पूरी शक्ति- धन, समय, ज्ञान-समाज के लिए समर्पित करना ही सच्ची पूजा है। मुझे जो भी मिलता है, वह समाज से मिलता है। सब कुछ समाज का है, परमेश्वर का है, जैसे- सूर्य को अर्घ्य देते समय, नदी से पानी लेकर फिर से नदी में डलते हैं।
मैं, मेरा के अहंकार भाव के लिए कोई स्थान नहीं। परंतु आज चारों ओर व्यक्ति के अहंकार को बढ़ावा दिया जा रहा है। इस लिए सारी राक्षसी प्रवृत्तियां- अहंकार, ईर्ष्या, पदलोलुपता, स्वार्थ बढ़ गया है, बढ़ रहा है। इन सब आसुरी प्रवृत्त्यिों को नष्ट करते हुए त्याग, तपस्या, प्रेम, निरहंकार से युक्त गुणों को अपने जीवन में लाने की साधना ही गुरु पूजा है।


rss.org से साभार

ekatma

Related Posts

पाकिस्तानी हिन्दुओं को क्यों हर दिन होता है हिन्दू होने पर पछतावा

पाकिस्तानी हिन्दुओं को क्यों हर दिन होता है हिन्दू होने पर पछतावा

राष्ट्र निर्माण की धुरी है यह भव्य राम मंदिर

राष्ट्र निर्माण की धुरी है यह भव्य राम मंदिर

अटलजी की कविता : दूध में दरार पड़ गई

अटलजी की कविता : दूध में दरार पड़ गई

कितने मुस्लिम पुरुष हैं जो हिन्दू महिला के प्रेम में हिन्दू बने?

कितने मुस्लिम पुरुष हैं जो हिन्दू महिला के प्रेम में हिन्दू बने?

Recent Posts

Recent Comments

Archives

Categories

Meta